अलाउद्दीन खिलजी इतिहास,मौत,बीबी,सादी,औलाद पूरी जानकारी | Alauddin Khilji History in Hindi

alauddin khilji history in hindi? आपने कभी इतिहास तो पढ़ा ही होगा इतिहास में आपने बहुत कुछ पढ़ा होगा सुना होगा और लिखा भी होगा आपने कभी अपने विद्यालय में इतिहास की किताब जरूर पड़ी होगी इतिहास में आपने जाना होगा कि भारत का इतिहास कितना विशाल और बड़ा है भारत का इतिहास इतना विशाल है कि इसके बारे में जितना पढ़ें उतना ही अच्छा है तो हम आज आपको भारत के इतिहास से जुड़ी हुई एक बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी के बारे में बताने बाले है जो अलाउद्दीन खिलजी के बारे में है आज हम आपको अलाउद्दीन खिलजी के बारे में उसकी उपलब्धियों के बारे में और उसकी विजय उसके राज्य विस्तार और उससे जुड़ी हुई बातें महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं।

अलाउद्दीन खिलजी

अलाउद्दीन खिलजी इतिहास? Alauddin Khilji History in Hindi?

अलाउद्दीन खिलजी का वास्तविक नाम अलिगुर्शप था और इसका राज्य अभिषेक सन 1296 मैं किया गया और इसका शासनकाल 1296 से 1316 तक रहा यह दिल्ली सल्तनत खिलजी वंश का दूसरा शासक था और इसका साम्राज्य अफगानिस्तान से लेकर उत्तर-मध्य भारत तक फैला हुआ था और ऐसा माना जाता है कि अगले 300 सालों तक इसके जैसा राजा नहीं हुआ जितना इसने साम्राज्य विस्तार किया था ऐसा माना जाता है की मेवाड़ की रानी पद्मावती को पसंद करता था और वह इतना मोहित था कि उसने मेवाड़ चित्तौड़ के विरुद्ध भीषण युद्ध अभियान छेड़ा था जो आज भी इतिहास में याद किया जाता है।

 

अलाउद्दीन खिलजी के बचपन का नाम गुरशास्प था व उसके समय उत्तर-पूर्व मंगोल से आक्रमण भी हुए लेकिन इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ा उसने इसका डटकर सामना किया और वह विजय भी रहा दिल्ली जलालुद्दीन खिलजी के तख्त पर बैठने के बाद अलाउद्दीन खिलजी को “अमीर-ए-तुजुक” पद हासिल हुआ मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन खिलजी ने कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी सौंप दी व भिलसा चंदेरी व देवगिरी के सफल अभियान से प्राप्त अपार धन से उसकी स्थिति और भी मजबूत हो गई और वह और भी ताकतवर हो गया इस प्रकार उत्कर्ष पर पहुंचे अलाउद्दीन खिलजी ने धोखे से अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या अपने 2 सैनिकों के साथ(मुहम्मद सलीम तथा इख़्तियारुद्दीन हूद) मिलकर 22 अक्टूबर 1296 को कर दी जिस समय वह आपस में गले लग रहे थे 

 

उसी समय धोखे से उसकी हत्या करवा दी गई वह उसका सगा चाचा था जो उसे अपने पुत्र के जैसा प्रेम करता था फिर भी उसकी हत्या धोखे से करवा दी गई। अलाउद्दीन खिलजी ने यह सब सुल्तान के पद के लिए किया जो कि उसने तुरंत हत्या के बाद अपने आप को सुल्तान घोषित कर दिया दिल्ली के बलबन के लाल महल में अपना राज्य अभिषेक 22 अक्टूबर 1296 को करवाया और वह दिल्ली का सुल्तान बन गया

अलाउद्दीन खिलजी का जीवन परिचय? Alauddin Khilji’s life introduction in Hindi

क्रमांक जीवन परिचय बिंदु अलाउद्दीन खिलजी जीवन परिचय
1. पूरा नाम अलाउद्दीन खिलजी
2. दूसरा नाम जुना मोहम्मद खिलजी
3. जन्म 1250 AD
4. जन्म स्थान लक्नौथी (बंगाल)
5. पिता का नाम शाहिबुद्दीन मसूद
6. पत्नी कमला देवी
7. धर्म मुस्लिम
8. मृत्यु 1316 (दिल्ली)
9. बच्चे कुतिबुद्दीन मुबारक शाह, शाहिबुद्दीन ओमर

अलाउद्दीन खिलजी शासन व्यवस्था? Alauddin Khilji Government System in Hindi

अपने आप को राजा घोषित करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने तमाम मुसीबतों का सामना करते अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारंभ कर दिया वह अपनी प्रारंभिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर उसने सिकन्दर द्वितीय (सानी) की उपाधि ग्रहण की ओर इन सब का उल्लेख अपने राज्य के सिक्कों पर करवाया उसने विश्व विजय और अपना एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार कि अपने दोस्त व दिल्ली के कोतवाल के समझाने पर अपने विचार को उसने त्याग दिया इसके बावजूद अलाउद्दीन खिलजी ने ख़लीफा कि सता को मान्यता देते हुए ‘यामिन-उ-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की लेकिन उसने ख़लीफा से सहमति लेना आवश्यक नहीं समझा और उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया उसके समय में निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुंच गई थी और अलाउद्दीन खिलजी ने अपने धर्म को मान्यता न देकर राज्य हित को सर्वोपरि माना जो कि बहुत ही अच्छी बात थी।


अलाउद्दीन खिलजी निर्माण कार्य? Alauddin Khilji Construction Works in Hindi

इसके दरबार में अमीर खुसरो और हसन निजामी जैसे उच्च कोटि के विद्वानों को भी जगह प्राप्त थी और स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी ने अलाई दरवाजा व कुश्क-ए-शिकार का निर्माण करवाया था व इनके अलावा सिरी के किले, हजार खम्भा महल का निर्माण भी उसी के द्वारा करवाया गया था।


अलाउद्दीन खिलजी विद्रोहों का दमन? Suppression of Alauddin Khilji revolts in Hindi

लाउद्दीन खिलजी के राज्य में ऐसे कई विद्रोह हुए है जिनमें से एक 1299 में हुआ गुजरात में सफल अभियानों में प्राप्त धन के बटवारो को लेकर “नवी मुसलमानों” द्वारा किए गए विद्रोह का दमन नुसरत खा ने किया। दूसरा विद्रोह अकत खॉ ने किया यह उसने अपने मगोल मुसलमानों के सहयोग से किया था खिलजी के उपर प्राण घातक हमला किया गया लेकिन वो बच गया और उसने अपने भतीजे को पकड़कर मार दिया इसके पश्चात तीसरा विद्रोह अलाउद्दीन खिलजी की बहन के पुत्रों (मलिक उमर एवं मंगू ख़ाँ) ने ही मिलकर किया था लेकिन यह भी पराजय हुए और इनकी भी हत्या कर दी गई और इसके बाद चोथा विद्रोह दिल्ली के हाजी मोला ने किया जिसका दमन सरकार हमीद्दीन द्वारा किया गया।

इन सभी विद्रोह को दबा दिया गया व सफतापूर्वक इनका सामना किया गया इन सब के बाद अलाउद्दीन ने तुर्क अमीरों के विद्रोह किए जाने के कारणों का विशेष अध्ययन किया उनके विद्रोह के कारणों का पता लगाया और उन कारणों को खत्म करने के लिए उसने 4 अध्यादेश जारी किए जिनके अंदर अलग-अलग चीज़े रखी गई जो इस प्रकार से है।

 

प्रथम अध्यादेश – इसके अंदर अमीरों को दान उपहार व पेंशन के रूप में दी गई भूमी को वापस झपत कर उसपे अधिकार कर लिया गया जिस से अमीरों के पास न तो धन बचा और न ही भूमि जिस से वो और भी गरीब हो गए।

 

दितिय अध्यादेश – यहां इसके अंदर उसने गुप्तचर को संगठित कर गुप्तचर अधिकारी और गुप्तचर की नियुक्ति की ओर अपने काम को और भी अधिक सुरक्षित रखा।

 

तृतीय अध्यादेश – इसके अंदर अपनी प्रजा के लिए मदिरा सेवन व भांग का सेवन करने पर प्रतिबंध लगा दिया।

 

चतुर्थ अध्यादेश – इसके अंदर अमीरों के आपसी मेल-जोल व सार्वजनिक समारोह और विवाह जैसे सम्बन्धों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई।

यह चारों अध्यादेश पूरी तरह सफल रहे इसके अलवा अलाउद्दीन ने मुकदमों, खुतो और हिन्दू लगान के विशेष अधिकार को समाप्त कर दिया और पूरी तरह अपने नियम बना दिए।

 


हिंदुओं के साथ व्यवहार

अलाउद्दीन ख़िलजी एक मुस्लिम समुदाय से था तो इसमें कोई शक नहीं की वो हिंदुओ पर अत्याचार न करें क्युकी इतिहास गवा है कि ऐसा होता रहा है और वो तो बहुत निर्दय था वो हर संभव प्रयास करता था हिन्दू समाज को परेशान करने में और उन पर हर संभव अत्याचार करता था बयाना का काजी हिंदुवो की नीति के प्रति हर व्याख्या करता था और अलाउद्दीन ख़िलजी अपने राज्य के अंदर उसी का अनुसरण करता था अगर कहे तो काजी के अनुसार उसे (खिराज़ गुजार)”भेट देने वाला” कहा गया है और जब कभी भी माल विभाग का अधिकारी उनसे चांदी मांगे तो उन्हें विनम्रता पूर्वक बदले में स्वर्ण उपस्थित करना चाहिए उन्हें इस बीच कोई प्रश्न नहीं करना चाहिए

 

यदि राज कर वसूल करने वाला किसी हिन्दू को अपमानित करने के लिए हिन्दू को झुकने के लिए कहे तो उसे बिना विरोध किए हुए झुक जाना चाहिए ऐसा इसलिए किया जाता है कि उसे समान प्राप्त हो वह सम्मान का भाव प्रदर्शित हो सकें और उन्हें ऐसा लगता है कि स्वम खुदा ने ऐसा करने कि अनुमति उनको प्रदान कि है हिन्दू पैगम्बर के शत्रु माने जाते थे और ऐसा माना जाता है कि पैगम्बर साहब ने कहा है कि या तो वो मुस्लिम धर्म अपना के या फिर उनको मार दिया जाए व उनको दास व नौकर बना लिया जाए और उनके धन को राजकोष में जमा कर दिया जाए और अलाउद्दीन ख़िलजी ने ऐसे कई कार्य किए जिस से हिंदुओ का जीना दुरबर हो गया था और जियाउद्दीन बरनी के कहे अनुसार अलाउद्दीन ने ऐसे विचार व्यक्त किए है कि

हिन्दू मेरा आदेश पाते ही ऐसे भाग जाते है कि जैसे कोई बिल में चूहे एक साथ दौड़ते हुए गुस जाते है कहने का मतलब है कि इतना खोफ़ हिन्दू के बीच मुगलों ने कर रखा था। 


साम्राज्य विस्तार

अलाउद्दीन ख़िलजी साम्राज्य विस्तार प्रवती का था यानी उसे अपने राज्य का विस्तार करना पसंद था और उसने काफी हद तक अपने राज्य का विस्तार किया उसने उतर भारत के कई राज्यो को जीतकर शासन किया और दक्षिण भारत में भी कई राज्य जीते और उनसे वार्षिक कर वसूला और आपने राजकोष में बढ़ोतरी की ओर आपने साम्राज्य का विस्तार किया।

 

यहां पर हम कुछ महत्वपूर्ण युद्ध के बारे में चर्चा कर रहे हैं जो कि बहुत ही प्रमुख युद्ध माने जाते हैं उस काल के समय और अलाउद्दीन खिलजी की बहुत बड़ी उपलब्धियां मानी जाती है जो निम्न प्रकार से आप देख सकते हैं।

 

(1)जैसलमेर विजय – इस जगह अलाउद्दीन की सेना के कुछ घोड़े छीन लिए गए थे इसके विरोध में सुल्तान ख़िलजी ने विद्रोह किया और जैसलमेर के दुदा व उसके सहयोगी मित्र तिलक सिंग को 1299 में हराया और जैसलमेर को अपने अधीन किया।

 

(2) चित्तौड़ आक्रमण और मेवाड़ विजय – उस समय मेवाड़ के शासक राणा रतन सिंह थे और उनकी राजधानी उस समय चित्तौड़ थी और चित्तौड़ का किला सामरिक दृष्टि से सुरक्षित स्थान पर बना हुआ था जो बेहत मजबूत और सुरक्षित था किले में कब्जा करना कोई आसान काम नहीं था इसलिए ख़िलजी की नजर उस पर थी और माना तो यह भी जाता है कि अमीर खुसरव के रानी शैबा व सुलेमान के प्रेम-प्रसंग के उलेख आधार पर और सबसे महत्वपूर्ण पद्मावत की कथा को भी माना जाता है कहा जाता है कि वहां की रानी पदमावती इतनी सुंदर थी कि ख़िलजी उस की सुंदरता पर मोहित था और यही सबसे बड़ा कारण बना मेवाड़ पर आक्रमण करने का और युद्ध करने का और अंतत वह सफल भी हुआ और महाराज रावल रतन सिंह युद्ध में शहीद हुए

 

और अब पदमावती तक ख़िलजी पहुंचता तब तक पदमावती ने बाकी सभी रानियों और पूरे महल की स्त्रियों को साथ लेकर जौहर (अपने आप को आग में समर्पित कर दिया) कर लिया कुछ इतिहासकार इस पदमावती की कहानी को काल्पनिक मानते है और कहा तो यह भी जाता है कि मेवाड़ विजय के बाद ख़िलजी ने 30,000 राजपूतों का कतल करवा दिया और उसने चित्तौड़ का नाम खिज़ खाॅ के नाम से ‘ख़िज़्राबाद’ रखा  और वो खीज़ खा को सौंप कर दिल्ली अपने राज्य में वापस आ गया इसी के साथ ही मेवाड़ में रावल शाखा का खात्मा हुआ और कालांतर में दूसरी शाखा सिसोदिया वंश की थी जिन्हें भी “राणा” कहा जाता था और इस बीच चित्तौड़ को आजाद कराने का प्रयास राजपूतों द्वारा जारी था

 

इसी दौरान ख़िलजी ने ख़िज़्र ख़ाँ को वापस दिल्ली बुला लिया और चित्तौड़ की सूबेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दी इसके बाद अलाउद्दीन ख़िलजी की मृत्यु हो गई उसकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ गया उसकी मृत्यु के बाद गुहिलोत राजवंश के हमिरदेव ने माल्देव पर आक्रमण मेवाड़ पर अपना अधिकार बना लिया और एक बार फिर ख़िलजी की मृत्यु के बाद चित्तौड़ फिर से आजाद हो गया।

 

(3) मालवा विजय – मालवा के शासन कर्ता बहुत ही बहादुर थे महलकदेव और उसका सेनापती हरनन्द वहां के शासन करने वाले थे 1305 ई. में अलाउद्दीन ख़िलजी ने मुल्तान के सूबेदार आईन-उल-मुल्क के नेतृत्व में अपनी सेना को मालवा पर विजय पाने के लिए भेजी दोनों के बीच खूब सगर्ष हुआ और अंतिम में मालवा के महलकदेव की हार हुई नवम्बर 1305 ई. में मालवा के साथ ही धारानगरी, चंदेरी, उज्जैन को दिल्ली की सलतनत में शामिल कर लिया गया था फिर अलाउद्दीन ने 1308 ई. में सिवाना पर अधिकार करने के लिए युद्ध छेड़ा वहां के राजा परमार राजपूत शितलदेव ने बहुत ही कड़ा संघर्ष किया परंतु इस से उसे कोई लाभ नहीं मिला अंत में उसकी मृत्यु हो गई और इसके बाद वहां का शासक कमालुद्दीन गुर्ग को घोषित किया गया ।

 

(4) दक्षिण विजय – अलाउद्दीन ख़िलजी के समय इस क्षेत्र में सिर्फ 3 ही महा शक्तियां थी देवगिरी के यादव और तेलगाना के काकतीय,व द्वारसमुद्र के होयसल प्रमुख थे ख़िलजी के पास पहले से बहुत साम्राज्य था अब वो सिर्फ धन के लिए इन राज्यो से कर वसूल करना चाहता था और दक्षिण भारत विजय का मुख्य श्रेय मलिक काफूर को ही जाता है अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ईस्वी में तेलंगाना पर आक्रमण किया है इसी दौरान तेलंगाना के शासक रुद्रदेव द्वितीय ने अपनी सोने की मूर्ति बनाकर उस पर जंजीर लपेटे हुए अपने आप को आत्मसमर्पण करते हुए वह मूर्ति मलिक काफूर के पास भेजा और इसके अलावा प्रताब रुद्रदेव ने इसी बीच मलिक काफूर को संसार प्रसिद्ध कोहिनूर काहिरा भेंट में दे दिया।

 

(5) जालौर विजय – कान्हणदेव जालौर के शासक ने 1304 में अपने आपको अलाउद्दीन खिलजी को समर्पण कर दिया था लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने आप को स्वतंत्र कर लिया इसी दौरान 1311 ई. में कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सुल्तान की सेना ने जालौर पर आक्रमण कर दिया और कान्हणदेव की पराजय हुई और उसकी हत्या कर दी गई और जालौर पर विजय के साथ ही अलादीन खिलजी की राजस्थान पर विजय का कठिन कार्य पुरा हुआ और भारत में कश्मीर असम और नेपाल ऐसे ही क्षेत्र बचे थे जिन पर खिलजी अपना शासन नहीं कर सका उत्तर भारत पर अपना अधिकार जमाने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिणी भारत की ओर अपना रुख किया कान्हड्देव प्रबन्ध के अनुसार कान्हड्देव के पुत्र विरमदेव प्रेम फिरोजा से था जो कि अलाउद्दीन ख़िलजी की पुत्री थी और यही इस आक्रमण का मुख्य कारण बना ।


अलाउद्दीन खिलजी मृत्यु

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तो उम्मीद है दोस्तों आपको यहां पर आपके जरूरत कि जानकारी आपको मिल गई होंगी अलाउद्दीन मुगलों का शासन कर्ता था उसने अनेक ऐसे काम किए जो इसनियत के लिए निर्दय थे लेकिन अंत उसका भी हुआ तो भुराई की कभी जीत नहीं होती तो इसी के साथ दोस्तों आपको इस से जुड़ा हुआ कोई सवाल य कोई जानकारी चाहिए तो आप हमें नीचे comment box में comment जरूर करें।

धन्यवाद …….।

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